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(गुरु पूर्णिमा की पूर्वबेला में शांतिकुंज परिसर में 1977 को दिय
मित्रो, पारस के बारे में आप लोगों ने सुना होगा कि पारस को छूकर लोहा सोना हो जाता है, बदल जाता है। यदि लोहा वैसा ही रहे और पारस से कहे कि आप लोहा बन जाइए, तो यह संभव नहीं। पारस लोहा नहीं बन सकता। लोहे को ही बदलना पड़ेगा। चंदन के पास उगे हुए पौधे चंदन की सी खुशबू देते हैं और चंदन बन जाते हैं। पर आप तो यह चाहते हैं कि चंदन को ही हम जैसा बनना चाहिए। चंदन आप जैसा नहीं बन सकता। छोटी झाड़ियों को ही चंदन जैसा खुशबूदार बनना चाहिए। चंदन बदबूदार झाड़ी नहीं बन सकता। भगवान पर दबाव मत डालिए। तब क्या करना पड़ेगा? आप उसके साथ में घुल जाइए, लिपट जाइए। बेल देखी है न आपने, वह पेड़ के साथ में लिपट जाती है और जितना ऊंचा पेड़ है, उतनी ऊंची होती चली जाती है। यदि बेल अपनी मनमर्जी से फैलती तो सिर्फ जमीन पर फैल सकती थी, और ऊंचा उठना मुमकिन नहीं था। परंतु इतनी ऊंची कैसे हो गई? क्योंकि वह पेड़ से गुथ गई, लिपट गई। आप भी भगवान से गुथ जाइए, लिपट जाइए, फिर देखिए कि आपकी ऊंचाई भी पेड़ पर लिपटी हुई बेल के बराबर होती है कि नहीं। भगवान बहुत ऊंचा है, आप उसके साथ जुड़कर के देखिए, उसके अनुशासन को पालिए। उसकी इच्छा के साथ चलिए, फिर आप देखिए कि भगवान के बराबर बन जाते हैं कि नहीं। पतंग अपने आपको बच्चे के हाथ में सौंप देती है। बच्चे के हाथ में उस बंधी हुई डोरी का एक सिरा होता है जिसे वह झटका देता रहता है और पतंग आसमान में जा पहुंचती है। पतंग अपनी डोरी को बच्चे के सुपुर्द न करे तब, उसे जमीन पर पड़ा रहना पड़ेगा।
*क्रमशः जारी*
*पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य*
*समस्त आदरणीय एवं सम्माननीय मातृशक्ति एवं भ्राता जनों को हृदय से यथा योग्य सादर प्रणाम*🙏🙏🙏🙏